Tuesday, September 30, 2008

संजीवनी पर विवाद





चिट्ठाजगत अधिकृत कड़ी
ये सामान्य पादप हैं - वनस्पति वैज्ञानिक प्रोफेसर भट्ट
लोकव्यवहार में भी नहीं ऐसी बूटी- मनोहरकान्त ध्यानी 
राजेन्द्र जोशी 
देहरादून : पतंजलि योग पीठ के स्वामी बालकृष्ण तो हनुमान जी से भी तेज निकले जो सीधे द्रोणगिरी पर्वत पर जा पहुंचे और उस संजीवनी को उठा लाये, जिसकी पहचान हनुमान जी तक को नहीं थी। तभी तो हनुमान जी पूरा का पूरा द्रोणागिरी पर्वत उठाकर श्री लंका रख आये और जहां सुषेन वैद्य ने इस पर्वत से ढंूढने के बाद लक्ष्मण की मूच्र्छा ठीक किया था। योग पीठ के स्वामी के इस दावे पर कि वे द्रोणागिरी पर्वत से संजीवनी ले आये हैं, पर अंगुलियां उठनी शुरू हो गयी हैं। कि जब हनुमान जी द्रोणगिरी पर्वत उठाकर श्री लंका रख आए हैं तो बालकृष्ण जी ने संजीवनी आखिर कौन से पर्वत से व कहां से ढंूढ़ी और यदि संजीवनी अभी तक बची है तो हनुमान जी क्या ले गए थे और क्या वह परम्परा भी झूठी है जो यहां के लोग हनुमान की की पूजा इस लिए नहीं करते कि वे इस क्षेत्र से पूरा का पूरा पहाड़ ही श्री लंका रख आए थे। इससे तो यह लगता है कि या तो हनुमान जी यहां से द्रोणागिरी पर्वत नहीं ले गये और या फिर यहां की लोकमान्यता ही गलत है। उल्लेखनीय है कि बीते दिनों पतंजलि योगपीठ के स्वामी बालकृष्ण द्वारा द्रोणागिरी पर्वत पर जाकर तीन दिन के भीतर ही वहां से संजीवनी बूटी लाने का दावा किया गया था। वहां से लौटने के बाद उन्होने बताया था कि संजीवनी बूटी चार औषधि पादपों से मिलकर बनी है जिसमें मृत संजीवनी, विषालया कर्णी,सुवर्ण कर्णी तथा संधानी शामिल हैं। लेकिन आचार्य के इस दावे सेे प्रदेश के पादप विज्ञानी प्रोफेसर राजेन्द्र भट्टï सहमत नहीं हैं। उनका कहना है कि बालकृष्ण जी जिन पौधों की बात कर रहे हैं वनस्पति विज्ञान में वे असमान्य पादप नहीं हैं। वनस्पति शास्त्र में इन्हे सोसोरिया गोसिपी फोरा तथा सिलेनियम कहा जाता है। उन्होने वताया कि बालकृष्ण के हिसाब से वे अदभुत हो सकते हैं अथवा उन्हें उन्होने पहली बार देखा हो लेकिन वनस्पति विज्ञान की सैकड़ों पुस्तकों में इनका उद्हरण मिलता है, और वनस्पति विज्ञानियों को इसकी खूब जानकारी है। उन्हेाने बताया कि मध्य हिमालय के इस क्षेत्र के ऊंचे स्थानों जिन्हे बुग्याल कहा जाता है, में यह पौधे सामान्यतया मिलते हैं। उनका यह भी कहना है कि संजीवनी के बारे में अभी तक यह पता भी नहीं है कि वह केवल एक ही पादप था अथवा कई पाइपों के रस से बनी औषधि। उन्होने कहा बालकृष्ण को इसे संजीवनी बताने से पहले इसका रसायनिक परीक्षण जरूर कराना चाहिए था। उन्होने भी इसे सस्ती लोकप्रियता हासिल करने का गैर वैज्ञानिक तरीका बताया। वहीं श्री बदरीनाथ केदारनाथ मंदिर समिति के पूर्व अध्यक्ष तथा वर्तमान में योजना आयोग के उपाध्यक्ष मनोहर कांत ध्यानी जिन्हेाने अपने जीवन का अधिकंाश समय जोशीमठ, बदरीनाथ सहित इस मध्य हिमालय में गुजारा है बताते हैं कि यह केवल वाह-वाही लूटने का सस्ता तरीका है। उन्होने कहा कि वैज्ञानिकों के अनुसार हिमालय क्षेत्र को अभी पांच करोड़ साल पूरे हुए हैं जबकि त्रेतायुग में रामचन्द्र जी के समय को बीते अभी लगभग एक करोड़ 40 लाख साल ही हुए हैं। तब से लेकर अब तक प्रकृति में न जाने कितने बदलाव हुए हैं। वहीं उनके अनुसार राम काल के बाद महाभारत काल आया इसी समय से इन तीर्थ यात्राओं की शुरूआत हुई जब धौम्य मुनि पांडवों को इस मार्ग से ले कर गये थे। इस दौरान कहीं भी इस संजीवनी बूटी का जिक्र नहीं मिलता है। उनके अनुसार उत्तराखण्ड क्षेत्र प्राचीन काल से वैद्यों तथा रस शास्त्रियों की भूमि रही है तथा आयुर्वेद में यहां कई प्रयोग तथा अनुसंधान हुए हैं इतना ही नहीं स्थानीय लोगों के लोक व्यवहार में भी इस बूटी का कहीं कोई जिक्र नहीं है। ऐसे में यदि उन्होने वाकई यदि संजीवनी को खोजा है तो प्रशंसनीय है। वहीं इस मामले पर राज्य के आयुर्वेद विज्ञान के जाने माने आयुर्वेद शास्त्री पंण्डित मायाराम उनियाल का कहना है कि लोकपरम्परा अथवा लोकव्यवहार में भी इसका अभी तक कहीं प्रयोग नहीं मिला है लिहाजा अभी इस पर शोध किया जान जरूरी है तभी किसी निर्णय पर पहुंचा जा सकता है।

2 comments:

Arvind Mishra said...

अभी तो कलई खुलनी शुरू हुयी है अभी आगे आगे देखिये होता है क्या !स्वामी की लानत मलामत तो अभी बाकी है 1

Anonymous said...

ये तो व्‍यापारी हैं। कहीं से कुछ भी लाकर प्रपंच कर सकते हैं।